
एक शाख पर बैठी थी वो
पैरो को जमा कर बैठी थी
बैठी थी एक आस में
किसी की तलाश में
वो रूठी थी अपने आप से
सहमी थी हर आहात से
हर तरफ बहती हवाएं
उसके सहमे पंखों को हिलाए
एक दाना किस को दू
इस सोच में बैठी थी
एक शोर में वोह बिखर गयी
एक गोली का शिकार हो गयी
उफ़ न निकल पाई
बेरहमी किसी को थी
और वो सो गयी
अपने खून में लतपथ
अपने पंखो को ओढ़कर
वो सो गयी

